Friday, 19 October 2012


चलो चलता हूँ..! (हा हा हा ...!!)
अक्सर शाम की तनहाई मैं...
पड़ा रहता हूँ अपने आप मैं...
खोया खोया कभी जगा-जगा अंदरही अंदर...
चाँद की ओझल किरने, सूरज से उधार लीयी हुवी..
शांति मैं लथपथ ..
मेरे दायरे के इर्दगिर्द..भटकती हैं..
उसी शाम की आहोश मैं..!

कागज का पन्ना मेरे लाब्जोंको सहारता हैं अपने कंधोपर...
मन को कर देता हूँ निछावर लाब्जोंके आगाज मैं...
और तुम कहते हो 'क्या कविता लिखी हैं..!!'
कविता तो मैंने न देखी, न सुनी, न सोची, न लिखी..
बस उतर गयी इस दिलसे आपके दिमाख तक..
उसी बारिश की तरह जिसे पता भी नहीं वो किसे भिगाती हैं..!

जाओ पुछो सूरज से 'क्या उसे पता हैं वो ही चाँद की रौशनी हैं?'
वो कहेगा बेशक..'ये चाँद कौन हैं...?'
वैसेही देखता हूँ उन कागज पे लिखे लम्हों को, मैं परायी नजरसे..
सृजन के बाद अब वो मेरे नहीं हैं..पराये हैं मुझे उतनेही जितने तुम्हे...
वो कागज रख देता हूँ कही दूर, नजरोंके दीदार से भी दूर..
और मुस्कुराता हैं सूरज रात के अँधेरे मैं..चांदपर..

समय चलता हैं अपनी गतीसे और मैं चलता हूँ समय के साथ..
गुजर जाते हैं पल , लम्हे..दिन, महीने..साल ...
और अब याद आते हैं सिर्फ तुम्हारे वो काले बाल..
वो कभी घुटनों तक लम्बे हुवा करते थे..
अब घुटनेही ना रहे..!
देखो क्या खेल हैं वक्त का..!

फिर भी तुम्हारी मुस्कराहट आज भी वैसीही हैं...
तुम्हारी तस्वीर ढूंडता हूँ उस कोने मैं और मिल जाती हैं वोही कविता ...
अब वो भी तो बुढी हो गयी हैं..!!
देखता हूँ उस तरफ.. पानी भरे आखोंसे...
अब बचा हैं सिर्फ धुँआ...धुन्दला धुन्दलासा...

शाम सुरज्से बाते कर रही हैं...
चलो चलता हूँ..!

कवी बेजार (उर्फ अमृत)

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